देवी महात्म्य
आपदिं किं करणीयं ?
स्मरणीयं पादं अंम्बिकां।
ब्रह्मेवाच :
42 त्रैलोक्ये तु भवेत् पूज्य: कवचेनावृत: पुमान
43 इदं तु देव्या: कवचं देवानामपि दुर्लभं
य: पठेत प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रधयान्युत:
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्य च अपराजिता:
44 जीवेद्वर्षशतं संग्रामपमृत्यु विवर्जित:
नश्यन्ति व्याधय: सर्वे लूटता विस्फोटकादय
स्थावरं जंगमं चापि कृत्रिमं चापि यद्विषं।
कवच से आरक्षित पुरुष, तीनों लोकों में पूजनीय बनता है। देवों को भी दुर्लभ यह देवी कवच, जो जन रोज त्रिसंध्या में श्रद्धा से पड़ता है, उनको देवी के वरदान मिलेंगे। उनको त्रिलोक में पराजय न होगा, मगर विजय प्राप्त होती हैं। उनको अपमृत्यु नहीं होती है तथा वह सज्जन सौ साल, व्याधिहीन जीवन बिताएंगे। उनपर लगाया हुआ सभी काला टोना खत्म हो जाती है।
मां, है महामाये, मेरे देश पर विद्रोह करने वालों को मिटा दो। मेरे मित्रों का एवं मेरे रक्षा करो।

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