स़मरणीयं (अवलंबं ) पादं अंम्बिकां।।
देवी कवच स्तोत्र
ॐ नमझण्डिकायै
मार्कण्डेय उवाच:
यदं गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणां
मन्न अस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह 1
ब्रह्मोवाच:
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकं
देव्यास्तु कवचं दिव्यं तत् श्रृणैष्व महामुने 2
हे प्रभु, ब्रम्हा, आप मुझे परमं रहस्यमय मंत्र जो उपाय सर्व रक्षक एवं दुष्ट नाशक हो वह बताता है, वह सुनिए।

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