स़मरणीयं (अवलंबं ) पादं अंम्बिकां।।
कृष्णेन संस्तुते देवी शाश्वतभक्त्यातथांबिके
रुपं देहि जयं देहि यशोदेहि द्विषोजहि।। 16
हिमाचल सुतानाथपूजिते परमेश्वरी
रुपं देहि जयं देहि यशोदेहि द्विषोजहि।। 17
सुरासुरशिरोरत्ननिखृष्टचरणांबिके
रुपं देहि जयं देहि यशोदेहि द्विषोजहि।।18
इन्द़ाणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरी
रुपं देहि जयं देहि यशोदेहि द्विषोजहि।। 19
देवी प्रचण्डदोरदण्ड दैत्य दर्प विनाशिनी
रुपं देहि जयं देहि यशोदेहि द्विषोजहि।। 20
हे माते,श्री कृष्ण ने कही बार भक्ति पूर्वक स्तुती किये माते, मेरे दुश्मनों को मारो। हिमाचलपुत्री पार्वती पूजनेवाली परमेश्वरी अंबिके, मेरे शत्रुओं को मारो।
देवी और असुर दोनों आपके चरणों में मस्तक लगाते हैं, उस देवी हमारे शत्रु नाशक करो। उत्तम भक्ति से इन्द्र से पूजित परमेश्वरी आप हमारे शत्रु नाश करो।
अति शक्तिशाली असुर जनों के गर्व शमन करने वाली अंबिके तू हमारे शत्रु विनाश करो, हमें सरुप, विजय एवं यशस्वी बनाओ।

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