Monday, February 22, 2010

कविताये भगवद गीता पर !!

ॐ पर्थ को प्रबोदिथ करने भगवान ..... नारायण स्वयं बताया बाते,
व्यास मुनि रचाया पूरण महान .... महाभारत के अंग हे गीता।

भागवत वाणी गीता देवी ..... अद्वैत अमृत बरसती तू
आप के सारांश पाने हम .... आप के चरण शरण लेते हे।

तपलींन नेत्र महा मुनि व्यास .... महान कविराज तुमेप्रणाम,
भारत दीप जलाया आपने .... ज्नान मय विचार धरा से ।

पारिजात कुसुम सम निर्मल ..... गोविन्द महाराधि चाबुक द्धारी ,
gइत अमृत दुहने वाला गोपाल ..... कृष्ण तेरा ज्नान मुद्रा को प्रणाम।

सारे उपनिषदे हे गोव ..... दुहने वाला गोपाल नन्द ,
पर्थ हे बछडा विद्यार्थी भोक्ता .... दूध हे महाद गीतामृत ॥
वासुदेव का सुत तू देव ...... कंस चनुर को मरता तू।
देवकी की नंदन तू कृष्ण ..... जगत गुरु तुमे प्रणाम ॥

भीष्म - द्रोण तल जयद्रध जल ..... गंधार है अंदर के भवरे ।
शल्य गहराई कृपर फुहार ..... कर्ण है आंधी तारांक भयंकर ।
अस्वधामा - विकर्ण सम दुष्ट मकर भर .... दुष्कर दुर्योधन रन समुन्दर ।
पार किया पांडव सुख तर ...... केशव को कर्णधार बनानेसे ॥

मुनि परासर कहते है ...... भारत है झील काव्यों का।
गीता है कमल उपदेशों का .... सार उल्कड़ गंध उनका ।
विविध आख्यान पराग रेनू है .... हरी - कधा रूप रचाया है॥

दुनिया के सभी सज्जन ..... तितली जैसे आते है।
धरती के झील भारत में .... पियूष कमल गीता के पीने ।
जो कलि - मल नष्ट कर देता है .... सब को मंगल देता है।
इसलिए भारत विराजेगा .... दुनिया में यश नित्य बड़ा कर ॥

गुंगा गाने लगता है .... पंगु भागते पार पहाड़ ।
एइसे कृपाकर माधवजी ... परम आनंद दाता तुम्हे प्रणाम॥


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